मानो प्रकृति का गौना लिवाने स्वयं आते हैं भोलेनाथ

डा.विधि नागर, कथक नृत्यविदुषी

षड्ऋतुओं में सभी का अपना-अपना अस्तित्व है। परंतु फाग की अल्हड़ मस्ती और सावन की झीनी फुहार का तो अपना ही मजा होता है। जब ग्रीष्म के ताप से झुलसे तन पर सावन की रिमझिम फुहारें पड़ती हैं तो तन के साथ-साथ मन भी भींग कर मयूर की तरह नाच उठता है। प्रकृति तो जैसे हरी चूनर से सजी ऐसे इठलाने लगती है कि जैसे गौने में उसको लिवाने स्वयं भोलेनाथ उसी के लिए तो आए हैं। श्रावण मास तो शंभू शंकर बाबा काशी विश्वनाथ का मास है। शिवजी जहां हों वहां संगीत का होना नितांत अनिवार्य है। मेघ, मयूर, धरती, नदियां, पवन, वृक्ष-लताएं, चंद्र-तारे सभी अपने वेग से रुद्र का गुणगान करने लगते हैं। फिर हम सब तो मनुष्य ही हैं अपने-अपने भावों की अंजुरी बना कर आदिदेव को श्रावण में समर्पित करके कैलाश धाम और मोक्ष की कामना करने लगते हैं।

कलाकार, शिव और प्रकृति दोनों की ही स्वर-ताल-लयबद्ध रचनाओं से अभिषेक करने लगते हैं। जहां एक ओर शास्त्रीय गायन में पं. रामदास कृत ध्रुपद ‘बादल गरज नव घोर’ गूंज उठाता है तो ख्याल गायकी में भी रामरंग की रचनाएं बरबस ही विरहिणी नायिका के अंतस से फूट पड़ती है कि-हे बादल मुझ विरहिणी के नयनों के आगे तू भला बरस कर क्यों अपना मान बढ़ा रहा है, तू तो सावन ऋतु में आता है पर मेरे नयनो को ऋतुओं की आस कहां, वह तो दिन रैन बरसते हैं।

‘तू क्यों मान करे रे बदरा, मो विरहिन नैनन के आगे,

तू बरसे ऋतु पावस आए, रामरंग मेरो नैन दिन रैन झरे…।’

सावन ऋतु में उपशास्त्रीय गायन में कजरी, झूला, दादरा, सादरा, ठुमरी की बानायगी पर नृत्यकारों की अदाएं भी बरबस मन रेत देती हैं। कथक नृत्य में कजरी ‘बैठी सोचे बृजधाम, सूनो लागे मेरो धाम’ में विरहोत्कंठिता नायिका तो दादरा में ‘रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे, मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे’ की मुग्धा नायिका की चपलता और सरसता का रस देखते ही बनता है। पं. बिंदादीन महाराज द्वारा रचित झूला ‘झूलत राधे नवल किशोर, जड़ित मणि दोऊ खंभ राजत, झोंके देत झकोर… झूलत राधे…’ जैसी पारंपरिक रचनाओं पर नृत्य का विधान है। अनेक कवित्त, परन और तिहाइयों का भी सावन के साथ चोली-दामन का साथ है। रायगढ़ घराने की बादल-बिजली परन बहुत प्रसिद्ध है जिसमें तड़न्न धेट-धेट, धागेनकत्-धागेनकत् जैसे बोलों से बिजली, बादल, बूंदों का दर्शकों को पूर्ण आभास मिलता है। एक कवित्त-

‘रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे, तड़तड़ तड़तड़ बिजुरी चमके,

दादुर मोर पपीहा टेर सुनावत, टेह कुकु टेह कुकु, कुकु टेह कुकु ’

गत में मयूर गत को नर्तक विशेष रूप से प्रदर्शित करते हैं। इसके अतिरिक्त नाव की गत, बादल, बिजली, पवन, गज की गत भी प्रसिद्ध है। सावन के आते ही नायिका का मन, अपने नायक से मिलने को तड़प उठता है और वह अपने छुपे हुए भावों को अंजाने ही सखि से व्यक्त कर बैठती है-

‘बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की,

सावन में उमग्यो मेरो मन, भनक पड़ी हरि आवन की…।’

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